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Friday, 6 May 2016

परम श्रद्धेय अर्चना दीदी ------ एक दिव्य व्यक्तित्व

                                 परम श्रद्धेय  अर्चना दीदी ----------    एक दिव्य व्यक्तित्व 







तेजस्वी मुखकमल , करुणा तथा प्रेम से पूरित नेत्र , होंठोंं पर शिशु सम भोली मुस्कान , अन्तःकरण में पवित्रता तथा सात्विकता का लहराता महासगर वैराग्य तथा ज्ञान की मूर्तिमान्  स्वरूप , ध्यान की अतल गहरााइयों के फलस्वरूप रोम - रोम से फूटता स्वर्णीम  प्रकाश, स्नेहमयी माँ  सम कोमल हृदय की स्वामिनी प्राातः स्मरणीयाा " अर्चना दीदी " मानो उस परम का ही ह्स्ताक्षर हैं | श्वेत परिधान में सुसज्जित श्वेत आत्मा अपनी उपस्थिति  मात्र से वातावरण को जीवंत तथा मधुरतापूर्ण  कर देती है | उनके आभामंडल की दिव्य तरंगों के घेरे मे जो भी व्यक्ति आता है , वह दिव्य आकर्षण की तरंगों से तरंगित हुए बिना नही रह सकता |

" अर्चना दीदी " की शुभाकांंक्षा  है कि जिस पथ की पथिक बनकर उन्होंने अमृतपान किया , उस पथ पर समस्त विश्व अग्रसर हो सके |  प्रत्येक मुख पर मुस्कान के फूल खिलेंं, हर चक्षु  के अश्रुु धुल जाएँँ, हर हृदय की वीणा  पर परम का संगीत गूँँजे, हर दिशा शांति  व प्रेम की सुवास से सुवासित हो जाए, हर जीवन पुष्प की भांति खिल सके, यही उनकी मंगल कामना है |

इसी पवित्र परोपकारी भाव की नीव पर दीदी ने ( CELEBERATING LIFE FOUNDATION  ) का भव्य मंदिर संंस्थापित किया है | दीदी ने मानव समाज की विभिन्न समस्याओंं, मानवीय संबंधो, व्यक्तिगत समस्याओंं तथा मानसिक व शारिरिक रोगों के मूूलभूूत कारणों व निवारण पर गहन चिन्तन मनन किया है | ध्यान साधना की प्राचीन विधियाँ किस प्रकार आज के मनुष्य के तनाव , अशांति , अवसाद तथा अन्यान्य मनोरोगों की चिकित्सा में लाभकारी सिद्ध हो सकती है तथा किस प्रकार व्यक्ति का सर्वागीण विकास हों सकता है , इस स्न्धर्भ  में दीदी ने अनेक नूतन प्रयोग किए तथा अनेक विधियों का अनुसंधान किया | ध्यान , प्राणायाम , योग , विचार , शक्ति आदि विभिन माध्यमोंं से व्यक्ति अपनी प्रत्येक समस्या का समाधान खोज सके, यही दीदी दवा्रा गठित CELEBERATING LIFE FOUNDATION का उद्ध्येश  है |









Thursday, 28 April 2016

मुसकुराते भगवान

गरमी का मौसम था, मैने सोचा काम पे जाने से पहले गन्नेका रस पीकर काम पर जाता हूँ।एक छोटे से गन्ने की रस की दुकान पर गया !!
वह काफी भीड-भाड का इलाका था, वहीं पर काफी छोटी-छोटी फूलो की, पूजा की सामग्री ऐसी और कुछ दुकानें थीं। और सामने ही एक बडा मंदिर भी था , इसलिए उस इलाके में हमेशा भीड रहती है !
मैंने रस का आर्डर दिया , मेरी नजर पास में ही फूलों की दुकान पे गयी , वहीं पर एक तकरीबन 37 वर्षीय सज्जन व्यक्ति ने 500 रूपयों वाले फूलों के हार बनाने का आर्डर दिया , तभी उस व्यक्ति के पिछे से एक 10 वर्षीय गरीब बालक ने आकर हाथ लगाकर उसे रस की पिलाने की गुजारिश की !!

पहले उस व्यक्ति का बच्चे के तरफ ध्यान नहीं था , जब देखा....तब उस व्यक्ति ने उसे अपने से दूर किया और अपना हाथ रूमाल से साफ करते हुए" चल हट ...."कहते हुए भगाने की कोशिश की !!
उस बच्चे ने भूख और प्यास का वास्ता दिया !!
वो भीख नहीं मांग रहा था , लेकिन उस व्यक्ति के दिल में दया नहीं आयी !!
बच्चे की आँखें कुछ भरी और सहमी हुई थी, भूख और प्यास से लाचार दिख रहा था !!
इतने में मेरा आर्डर दिया हुआ रस आ गया !!
मैंने और एक रस का आर्डर दिया उस बच्चे को पास बुलाकर उसे भी रस पीलाया !!
बच्चे ने रस पीया और मेरी तरफ बडे प्यार से देखा और मुस्कुराकर चला गया !!
उस की मुस्कान में मुझे भी खुशी और संतोष हुआ.......लेकिन. ....वह व्यक्ति मेरी तरफ देख रहा था, जैसे कि उसके अहम को चोट लगी हो !!
फिर मेरे करीब आकर कहा"आप जैसे लोग ही इन भिखारियों को सिर चढाते है"मैंने मुस्कराते हुए कहा आपको मंदिर के अंदर इंसान के व्दारा बनाई पत्थर की मूर्ति में ईश्वर नजर आता है, लेकिन ईश्वर द्वारा बनाए इंसान के अंदर ईश्वर नजर नहीं आता है..........मुझे नहीं पता आपके 500 रूपये के हार से आपका मंदिर का भगवान मुस्करायेगा या नहीं, लेकिन मेरे 10 रूपये के चढावे से मैंने भगवान को मुस्कराते हुए देखा और मुझे संतुष्टी भी देकर गया है !!